Bachendri Pal In Hindi Essay In Hindi

Bachendri Pal Biography in Hindi : साहस और जीवन के बल पर कुछ लोग असंभव प्रतीत होने वाले कार्यों को पूर्ण करते हैं, क्योंकि वे अपनी प्रतिभा के अनुसार ही अपने लक्ष्य भी तय करते हैं। व्यक्ति की महानता इस बात में नहीं है कि वह किसी विशिष्ट उपलब्धि को प्राप्त करे, जबकि उस उपलब्धि योग्य उसकी योग्यता ही क्यों न हो! व्यक्ति को अपनी क्षमता व परिस्थितियों का भी समस्त विश्लेषण करना आना चाहिए। बछेंद्री पाल भी एक ऐसा ही नाम है, जिसने अपनी क्षमताओं के अनुसार, अपने पसंदीदा कार्य को ही अपने जीवन में लक्ष्य बनाया। वह लक्ष्य था माउंट एवरेस्ट पर फतह हासिल करने का। इन्होंने ऐसा किया भी। ऐसा करने वाली यह भारत की प्रथम तथा विश्व की पांचवी महिला बनीं। यही इनकी महानता भी रही है।

Bachendri Pal Biography in Hindi

बछेंद्री पाल की जीवनी


साहस और जीवन के बल पर कुछ लोग असंभव प्रतीत होने वाले कार्यों को पूर्ण करते हैं, क्योंकि वे अपनी प्रतिभा के अनुसार ही अपने लक्ष्य भी तय करते हैं। व्यक्ति की महानता इस बात में नहीं है कि वह किसी विशिष्ट उपलब्धि को प्राप्त करे, जबकि उस उपलब्धि योग्य उसकी योग्यता ही क्यों न हो! व्यक्ति को अपनी क्षमता व परिस्थितियों का भी समस्त विश्लेषण करना आना चाहिए। बछेंद्री पाल भी एक ऐसा ही नाम है, जिसने अपनी क्षमताओं के अनुसार, अपने पसंदीदा कार्य को ही अपने जीवन में लक्ष्य बनाया। वह लक्ष्य था माउंट एवरेस्ट पर फतह हासिल करने का। इन्होंने ऐसा किया भी। ऐसा करने वाली यह भारत की प्रथम तथा विश्व की पांचवी महिला बनीं। यही इनकी महानता भी रही है।

जन्म और परिवार : Bachendri Pal Biography in Hindi

बछेंद्री पाल का जन्म 24 मई, 1954 में भारत-तिब्बत सीमा प्रांत पर हुआ। इनके पिता की पांच संततियों में यह मंझली थीं, अर्थात तीसरे क्रम की संतान थीं। इनके पिता एक निर्धन व्यापारी थे जो घोड़ों, टट्टुओं एवं बकरियों पर आटा एवं चावल भारत भूमि से तिब्बत की ऊंचाई पर ले जाते थे। अंततः इनका परिवार उत्तरकाशी में स्थायी रूप से बस गया था। बछेंद्री पाल स्वच्छंद प्रवृति की थीं और इन्हें हिमालय की तलहटियों में घूमते रहने का बेहद शौक था।

प्रारम्भिक जीवन और शिक्षा : Bachendri Pal Biography in Hindi

परिवार के सदस्य इनकी काल्पनिक बातों से मनोरंजन करते थे, जब बचपन के दौर में यह हवाई जहाज से यात्राएं करने व प्रसिद्ध लोगों से मिलने की बातें करती थीं। ऊंचाई के प्रति इनके रोमांच की यात्रा का आरंभ तब हुआ, जब यह 12 वर्ष की उम्र में अपनी साथियों के साथ पिकनिक मनाते हुए 13123 फीट की ऊंचाई पर जा पहुंचीं। चढ़ते समय इन्हें यह भी ध्यान नहीं रहा कि उतरते हुए इन्हें रात्रि हो जाएगी। यही हुआ भी। इन्हें रात्रि वहीं गुजारनी पड़ी, तब इनके पास न तो भोजन था और न ही रात्रि गुजारने के लिए कोई शरणस्थल। जाहिर है कि इस घटना ने पूत के पांव पालने में ही दिखा दिए थे। किंतु तब किसी ने भी नहीं सोचा था कि उस घटना से एक महान उपलब्धि का बीज भी भविष्य में प्रस्फुटित होगा।

13 वर्ष की उम्र में बछेंद्री से भी यह अपेक्षा रखी गई कि यह अन्य भारतीय लड़कियों की भांति शिक्षा छोड़ कर घर के कार्यों में हाथ बंटाना आरंम्भ करेंगी। लेकिन बछेंद्री देर रात तक पढ़ाई करती रहतीं और इनकी इस लगन ने घर वालों को मजबूर किया कि वह अपनी पुत्री को विद्यालय स्तर की पढाई पूर्ण कर लेने दंे। पढाई करने, घर का कार्य करने के अलावा भी समय मिलने पर बछेंद्री सिलाई-कढ़ाई करके कुछ धन कमा लेती थीं। इनके विद्यालय की प्राचार्या ने भी इनके परिवार को प्रेरणा दी कि बछेंद्री को महाविधालय में पढ़ने भेजा जाए, जहां ये राइफल शूटिंग और अन्य स्पर्धाओं मंे भी खासा नाम कमाएंगी। लिहाजा प्राचार्या की बात मान ली गई।

बछेंद्री ने कला में स्नातक की उपाधि प्राप्त करके घरवालों को गौरवान्वित कर दिया, क्योंकि यह गांव की प्रथम बाला थी, जिसने यह सफलता प्राप्त की थी। अंततः बेछेंद्री ने कला में स्नातकोत्तर की उपाधि भी प्राप्त की और फिर बी.एड. भी किया। इतना होने के बाद भी इनके लिए जो आजीविका के प्रस्ताव आए, उनमें वेतनमान काफी कम था। कनिष्ठ दर्जे का अस्थायी कार्य ही इन्हें प्राप्त हो रहा था,

एवरेस्ट विजय अभियान : Bachendri Pal Biography in Hindi

अतः बछेंद्री पाल ने नेहरू पर्वतारोहण संस्थान के पाठ्यक्रम हेतु आवेदन किया। इस पाठ्यक्रम में इनका चयन सर्वश्रेष्ठ छात्रा के रूप में किया गया और टिप्पणी की गई, ’एवरेस्ट हेतु योग्य’। इस टिप्पणी ने बछेंद्री को भी हैरत में डाल दिया।

1982 में ’नेशनल एडवेंचर फाउंडेशन’ के निदेशक ब्रिगेडियर ज्ञान सिंह, जो बछेंद्री के पथ प्रदर्शक भी थे, उन्होंने युवा महिलाओं हेतु साहसिक अभियान हेतु क्लब खोला था, ताकि उन्हें पर्वतारोहण की खूबियां सिखाई जाएं; इन्हीं के निर्देशन में बछेंद्री पाल ने गंगोत्री प्रथम (21900 फीट) और रूढ्गायरा (19091 फीट) की चोटियों को फतह करने में सफलता पाई। इस सफलता के बाद बछेंद्री को अनुदेशक (इंस्ट्रक्टर) का पद प्रदान किया गया, तब इनका परिवार आर्थिक दुश्वारियों को भोग रहा था।

1984 में एवरेस्ट हेतु भारत का चैथा अभियान प्रस्तावित था और तब तक महज चार नारियों के कदम ही माउंट एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक अपनी छाप छोड़ पाए थे। 1984 के इस अभियान में सात स्त्रियां एवं ग्यारह पुरूष चुने गए, जिनमें से बछेंद्री पाल भी एक थीं और बछंेद्री की यहां कड़ी परीक्षा होनी थी। यात्रा अभियान आंरभ होने के बाद बछेंद्री ने चोट एवं अन्य समस्याओं का सामना किया। कई बार लगा कि सफलता दूर चली गई है। लेकिन इन्होंने हौसला बनाए रखा और फिर 23 मई, 1984 को दोपहर 2 बज कर 07 मिनट पर इन्होंने माउंट एवरेस्ट (29028 फीट) पर फतह हासिल कर ली। इस प्रकार सागरमाथा (एवरेस्ट का नेपाली नाम) चढ़ने वाली बछेंद्री पाल प्रथम भारतीय नारी बन गईं।

इसके बाद 1985 में बछेंद्री पाल महिला दल के साथ पुनः एवरेस्ट अभियान पर गईं। सन् 1994 में इन्होंने उस महिला नौका दल का नेतृत्व किया, जिसने हरिद्वार (गंगा में) से कोलकता का सफर सफलता से तय किया। सन् 1997 में बछेंद्री ने पुनः महिला दल का नेतृत्व किया, जिसने हिमालय पर सात माह का समय गुजारते हुए उसे पार किया। अतः बछेंद्री पाल नारी जगत के लिए साहस, रोमांच और इच्छा शक्ति का पर्याय बन गई हैं। सभी को इन पर गर्व है।

पुरस्कार एवं सम्मान : Bachendri Pal Biography in Hindi

  • भारतीय पर्वतारोहण फाउंडेशन द्वारा पर्वतारोहण में उत्कृष्टता के लिए वर्ष 1984 में स्वर्ण पदक प्रदान किया गया.
  • तत्कालीन केंद्र सरकार ने इन्हें वर्ष 1984 में ही अपने प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया.
  • उत्तर प्रदेश सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा इन्हें वर्ष 1985 में स्वर्ण पदक से नवाजा गया.
  • भारत सरकार ने इन्हें वर्ष 1986 में अपने प्रतिष्ठित खेल पुरस्कार ‘अर्जुन पुरस्कार’ से सम्मानित किया.
  • इन्हें वर्ष 1986 में ‘कोलकाता लेडीज स्टडी ग्रुप अवार्ड’ से भी नवाजा गया.
  • इन्हें वर्ष 1990 में ‘गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में भी सूचीबद्ध किया गया.
  • भारत सरकार के द्वारा इन्हें वर्ष 1994 में ‘नेशनल एडवेंचर अवार्ड’ प्रदान किया गया.
  • उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वर्ष 1995 में इनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए ‘यश भारती’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
  • इन्हें वर्ष 1997 में हेमवती नन्दन बहुगुणा विश्वविद्यालय, गढ़वाल द्वारा पी-एचडी की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया.
  • मध्य प्रदेश सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने वर्ष 2013-14 में इन्हें पहला ‘वीरांगना लक्ष्मीबाई’ राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया.

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Shudhvichar

जन्म :24 मई, 1954 (उत्तरकाशी, उत्तराखंड)

वर्तमान : टाटा स्टीलकंपनी में पर्वतारोहण तथा अन्य साहसिक अभियानों की प्रशिक्षक

कार्यक्षेत्र : माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली प्रथम भारतीय महिला

भारत की बछेंद्री पाल संसार की सबसे ऊंची चोटी ‘माउंट एवरेस्ट’ पर चढ़ने वाली प्रथम भारतीय महिला हैं. बछेंद्री पाल संसार के सबसे ऊंचे पर्वत शिखर ‘माउंट एवरेस्ट’ की ऊंचाई को छूने वाली दुनिया की 5वीं महिला पर्वतारोही हैं. इन्होंने यह कारनामा 23 मई, 1984 के दिन 1 बजकर 7 मिनट पर किया था.

भारतीय अभियान दल के सदस्य के रूप में माउंट एवरेस्ट पर आरोहण के कुछ ही समय बाद इन्होंने इस शिखर पर चढ़ाई करने वाली महिलाओं की एक टीम के अभियान का सफल नेतृत्व किया. इसी प्रकार वर्ष 1994 में बछेंद्री ने महिलाओं के साथ गंगा नदी में हरिद्वार से कोलकाता तक लगभग 2,500 किमी लंबे नौका अभियान का नेतृत्व किया. हिमालय के गलियारे में भूटान, नेपाल, लेह और सियाचिन ग्लेशियर से होते हुए कराकोरम पर्वत-श्रृंखला पर समाप्त होने वाला लगभग 4,000 किमी लंबा अभियान भी इ­नके द्वारा इस दुर्गम क्षेत्र में ‘प्रथम महिला अभियान’ था.

प्रारम्भिक जीवन

बछेंद्री पाल का जन्म 24 मई, 1954 को वर्तमान उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) राज्य के उत्तरकाशी के पहाड़ों की गोद में हुआ था. उत्तराखंड राज्य के एक ग्रामीण परिवार में जन्मी बछेंद्री पाल ने स्नातक की शिक्षा पूर्ण करने के बाद शिक्षक की नौकरी प्राप्त करने के लिए बी.एड. का प्रशिक्षण प्राप्त किया. इन्हें स्कूल में शिक्षिका बनने के बजाय पेशेवर पर्वतारोही का पेशा अपनाने पर परिवार और रिश्तेदारों के तीव्र विरोध का सामना भी करना पड़ा था.

मेधावी और प्रतिभाशाली होने के बावजूद इनको कोई अच्छा रोज़गार नहीं मिला. जो मिला वह भी  अस्थायी, जूनियर स्तर का था और वेतन भी बहुत कम था. इससे ये काफी निराशा हुईं और इन्होंने अस्थाई नौकरी करने के बजाय ‘नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग’ का कोर्स करने के लिये आवेदन कर दिया. यहां से इनके के जीवन को नई दिशा मिली. वर्ष 1982 में एडवांस कैम्प के दौरान इन्होंने गंगोत्री (6,672 मीटर ऊंचाई) और रूदुगैरा (5,819 मीटर ऊंचाई) की चढ़ाई को पूरा किया. इस कैम्प में बछेंद्री को ब्रिगेडियर ज्ञान सिंह ने बतौर इंस्ट्रक्टर पहली नौकरी दी थी.

पर्वतारोहण का पहला मौक़ा

बछेंद्री के लिए पर्वतारोहण का पहला मौक़ा 12 साल की उम्र में आया, जब उन्होंने अपने स्कूल की सहपाठियों के साथ 400 मीटर की चढ़ाई की. यह चढ़ाई इन्होंने किसी योजनाबद्ध तरीके से नहीं की थी. दरअसल वे स्कूल पिकनिक पर गई हुए थीं और उसी दौरान पहाड़ पर चढ़ती गईं और शिखर तक पहुँचते-पहुँचते शाम हो गई. जब लौटने का खयाल आया तो पता चला की उतरना सम्भव नहीं है. ज़ाहिर है, रातभर ठहरने के लिये उन के पास पूरा इंतज़ाम नहीं था. बगैर भोजन और टैंट के इन्होंने खुले आसमान के नीचे रात गुजार दी.

एवरेस्ट अभियान

वर्ष 1984 में भारत का ‘चौथा एवरेस्ट अभियान’ शुरू हुआ. दुनिया में अब तक सिर्फ 4 महिलाएं ही  एवरेस्ट की चढ़ाई में कामयाब हो पाई थीं. इस अभियान में जो टीम बनाई गई उसमें बछेंद्री के साथ  7 महिलाओं और 11 पुरुषों को भी शामिल किया गया था. इस टीम ने 23 मई, 1984 के दिन 1 बजकर 7 मिनट पर 29,028 फुट (8,848 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित ‘सागरमाथा’ (एवरेस्ट) पर भारत का झंडा लहराया. इस के साथ ही ये एवरेस्ट पर सफलता पूर्वक क़दम रखने वाली दुनिया की 5वीं महिला बनीं.

पर्वतारोहण के क्षेत्र में इनका योगदान

बछेंद्री पाल ने वर्ष 1984 के एवरेस्ट पर्वतारोहण अभियान में पुरुष पर्वतारोहियों के साथ शामिल होकर एवं सफलता पूर्वक संसार की सबसे ऊंची चोटी ‘माउंट एवरेस्ट’ पर पहुंचकर भारत का राष्ट्रीय ध्वज लहराया और एवरेस्ट पर विजय पाई. उनकी इस सफलता ने आगे भारत की अन्य महिलाओं को भी पर्वतारोहण जैसे साहसिक अभियान में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया. ये भारत की पहली महिला एवरेस्ट विजेता हैं तथा देश-विदेश की महिला पर्वतारोहियों के लिए प्रेरणा की श्रोत भी हैं.

बछेंद्री पाल वर्तमान में ‘टाटा स्टील’ इस्पात कंपनी में कार्यरत हैं, जहाँ ये चुने हुए लोगों को पर्वतारोहण के साथ अन्य रोमांचक अभियानों का प्रशिक्षण देने का कार्य कर रही हैं.

आपदा राहत एवं समाजसेवाकेक्षेत्रमेंयोगदान

‘माउंट एवरेस्ट’ पर फ़तह हासिल करने वाली पहली भारतीय महिला बछेंद्री पाल की शख्सियत का एक दूसरा पहलू भी हमें जून, 2013 में उत्तराखंड की प्राकृतिक आपदा के दौरान देखने को मिला. जब इन्होंने वहां के लोगों को बचाने तथा राहत पहुंचाने में सशक्त भूमिका निभाई. इस आपदा में 4500 से ज्यादा लोग मारे गए, सड़कें ध्वस्त हो गईं, गांव के गांव मुख्य धारा से कट गए थे. इस संकट की घडी में 59 वर्षीय बछेंद्री पाल ने अपनी टीम के साथ, ट्रैकिंग के अपने हुनर और पहाड़ी इलाकों की गहन जानकारी का उपयोग करते हुए लोगों की जान बचाने और मुख्य धारा से कट चुके दूर-दराज के इलाकों तक राहत सामग्री पहुंचाने में अपना अमूल्य योगदान दिया.

बछेंद्री पाल ने इससे पहले भी कई आपदाओं में राहत और बचाव कार्य में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है. वर्ष 2000 में पहली बार राहत कार्य के लिए ये गुजरात गई थी. जहां आए भयंकर भूकंप से पीड़ित लोगों को अपने सक्षम वॉलंटियर पर्वतारोहियों की एक टीम की मदद से लगभग डेढ़ महीने तक अपनी सेवाएं दी और ज़रूरतमंद लोगों तक राहत पहुंचाई.

वर्ष 2006 में उड़ीसा में आए भयंकर चक्रवात ने बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान पहुचाया था. वहां पर इन्होंने अपनी टीम के साथ सेवाएं दी और ज़रूरतमंद लोगों तक राहत पहुंचाई, लोगों के दाह संस्कार में भी मदद किया.

पुरस्कार एवं सम्मान  

भारतीय पर्वतारोहण फाउंडेशन द्वारा पर्वतारोहण में उत्कृष्टता के लिए वर्ष 1984 में स्वर्ण पदक प्रदान किया गया.

तत्कालीन केंद्र सरकार ने इन्हें वर्ष 1984 में ही अपने प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया.

उत्तर प्रदेश सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा इन्हें वर्ष 1985 में स्वर्ण पदक से नवाजा गया.

भारत सरकार ने इन्हें वर्ष 1986 में अपने प्रतिष्ठित खेल पुरस्कार ‘अर्जुन पुरस्कार’ से सम्मानित किया.

इन्हें वर्ष 1986 में ‘कोलकाता लेडीज स्टडी ग्रुप अवार्ड’ से भी नवाजा गया.

इन्हें वर्ष 1990 में ‘गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में भी सूचीबद्ध किया गया.

भारत सरकार के द्वारा इन्हें वर्ष 1994 में ‘नेशनल एडवेंचर अवार्ड’ प्रदान किया गया.

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वर्ष 1995 में इनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए ‘यश भारती’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

इन्हें वर्ष 1997 में हेमवती नन्दन बहुगुणा विश्वविद्यालय, गढ़वाल द्वारा पी-एचडी की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया.

मध्य प्रदेश सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने वर्ष 2013-14 में इन्हें पहला ‘वीरांगना लक्ष्मीबाई’ राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया.



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